गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चै व परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: ॥30॥
(हस्तात्) हाथसे (गाण्डीवम्) गाण्डीव धनुष (स्त्रांसते) गिर रहा है (च) और (त्वक्) त्वचा (एव) भी (परिदह्यते) बहुत जल रही है (च) तथा (मे) मेरा (मनः) मन (भ्रमति, इव) भ्रमित-सा हो रहा है इसलिए मैं (अवस्थातुम्) खड़ा रहनेको (च) भी (न शक्नोमि) समर्थ नहीं हूँ।
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।