कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥39॥
तो भी (जनार्दन) हे जनार्दन! (कुलक्षयकृतम्) कुलके नाशसे उत्पन्न (दोषम्) दोषको (प्रपश्यभ्दिः) जाननेवाले (अस्माभिः) हमलोगोंको (अस्मात्) इस (पापात्) पापसे (निवर्तितुम्) हटनेके लिये (कथम्) क्यों (न) नहीं (ज्ञेयम्) विचार करना चाहिये?
तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?