सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ॥42॥
(संकरः) वर्णसंकर (कुलघ्नानाम्) कुलघातियोंको (च) और (कुलस्य) कुलको (नरकाय) नरकमें ले जानेके लिये (एव) ही होता है (लुप्तपिण्डोदक) गुप्त शारीरिक विलास जो नर-मादा के बीज और रज रूप जल की (क्रियाः) क्रियासे (एषाम्) इनके (पितरः) वंश (हि) भी (पतन्ति) अधोगतिको प्राप्त होते हैं।
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।