अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: ॥45॥
(अहो) हा! (बत) शोक! (वयम्) हमलोग बुद्धिमान् होकर भी (महत्) महान् (पापम्) पाप (कर्तुम्) करनेको (व्यवसिताः) तैयार हो गये हैं (यत्) जो (राज्यसुखलोभेन) राज्य और सुखके लोभसे (स्वजनम्) स्वजनोंको (हन्तुम्) मारनेके लिये (उद्यताः) उद्यत हो गये हैं।
हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं।