कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् | केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥17॥
(योगिन्) हे योगेश्वर! (अहम्) मैं (कथम्) किस प्रकार (सदा) निरन्तर (परिचिन्तयन्) चिन्तन करता हुआ (त्वाम्) आपको (विद्याम्) जानूँ (च) और (भगवन्) हे भगवन्! आप (केषु, केषु) किन-किन (भावेषु) भावोंमें (मया) मेरे द्वारा (चिन्त्यः) चिन्तन करनेयोग्य (असि) हैं।
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?