अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: | अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥20॥
(गुडाकेश) हे अर्जुन! (अहम्) मैं (सर्वभूताशयस्थितः) सब प्राणियों मंे स्थित (आत्मा) आत्मा हूँ अर्थात् आत्मा काल इशारे पर नाचती है इसलिए कहा है (च) तथा (भूतानाम्) सम्पूर्ण प्राणियों का (आदिः) आदि, (मध्यम्) मध्य (च) और (अन्तः) अन्त (च) भी (अहम्) मैं (एव) ही हूँ।
हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।