द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् | जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ॥36॥
(अहम्) मैं (छलयताम्) छल करनेवालोंमें (द्यूतम्) जूआ और (तेजस्विनाम्) प्रभावशाली पुरुषोंका (तेजः) प्रभाव (अस्मि) हूँ। (अहम्) मैं (जयः) विजय (अस्मि) हूँ। (व्यवसायः) निश्चय और (सत्त्ववताम्) सात्त्विक पुरुषोंका (सत्त्वम्) सात्त्विक भाव (अस्मि) हूँ।
मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।