वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय: | मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि: ॥37॥
(वृष्णीनाम्) वृृष्णिवंशियोंमें (वासुदेवः) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा (पाण्डवानाम्) पाण्डवोंमें (धनजयः) धन×जय अर्थात् तू, (मुनीनाम्) मुनियोंमें (व्यासः) वेदव्यास और (कवीनाम्) कवियोंमें (उशना) शुक्राचार्य (कविः) कवि (अपि) भी (अहम्) मैं ही (अस्मि) हूँ।
वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ।