बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम: | सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥4॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ ॥5॥
(बुद्धिः) निश्चय करनेकी शक्ति (ज्ञानम्) यथार्थ ज्ञान (असम्मोहः) असंमूढता अर्थात् अज्ञान रूप मोह से रहित (क्षमा) क्षमा (सत्यम्) सत्य (दमः) इन्द्रियोंका वशमें करना, (शमः) मनका निग्रह (एव) तथा (सुखम्,दुःखम्) सुख-दुःख (भवः, अभावः) उत्पति प्रलय (च) और (भयम्, अभयम्) भय-अभय (च) तथा (अहिंसा) अहिंसा (समता) समता (तुष्टिः) संतोष (तपः) तप (दानम्) दान (यशः) कीर्ति और (अयशः) अपकीर्ति (भूतानाम्) प्राणियोंके (पृथग्विधाः) नाना प्रकारके (भावाः) भाव (मतः) नियमानुसार (एव) ही (भवन्ति) होते हैं।
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।