नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप | एष तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥40॥
(परन्तप) हे परंतप! (मम) मेरी (दिव्यानाम्) दिव्य (विभूतीनाम्) विभूतियोंका (अन्तः) अन्त (न) नहीं (अस्ति) है (मया) मैंने अपनी (विभूतेः) विभूतियोंका (एषः) यह (विस्तरः) विस्तार (तु) तो तेरे लिये (उद्देशतः) एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे (प्रोक्तः) कहा है।
हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात् संक्षेप से कहा है।