द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा: | दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥20॥
(महात्मन्) हे महात्मन्! (इदम्) यह (द्यावापृृथिव्योः, अन्तरम्) स्वर्ग और पृृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश (च) तथा (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाएँ (एकेन) एक (त्वया) आपसे (हि) ही (व्याप्तम्) परिपूर्ण हैं तथा (तव) आपके (इदम्) इस (अद्भुतम्) अलौकिक और (उग्रम्) भयंकर (रूपम्) रूपको (दृृष्टवा) देखकर (लोकत्रायम्) तीनों लोक (प्रव्यथितम्) अति व्यथाको प्राप्त हो रहे हैं।
हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।