यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा: | तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा: ॥29॥
(यथा) जैसे (पतंगाः) पतंग मोहवश (नाशाय) नष्ट होनेके लिये (प्रदीप्तम्) प्रज्वलित (ज्वलनम्) अग्निमें (समृद्धवेगाः) अति वेगसे दौड़ते हुए (विशन्ति) प्रवेश करते हैं, (तथा) वैसे (एव) ही ये (लोकाः) सब लोग (अपि) भी (नाशाय) अपने नाशके लिये (तव) आपके (वक्त्राणि) मुखोंमें (समृृद्धवेगाः) अति वेगसे दौड़ते हुए (विशन्ति) प्रवेश कर रहे हैं।
जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।