आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद | विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥31॥
(मे) मुझे (आख्याहि) बतलाइये कि (भवान्) आप (उग्ररूपः) उग्ररूपवाले (कः) कौंन हैं? (देववर) हे देवोंमें श्रेष्ठ! (ते) आपको (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो आप (प्रसीद) प्रसन्न होइये। (आद्यम्) आदियम अर्थात् पुरातन काल (भवन्तम्) आपको मैं (विज्ञातुम्) विशेषरूपसे जानना (इच्छामि) चाहता हूँ (हि) क्योंकि मैं (तव) आपकी (प्रवृृत्तिम्) प्रवृृत्तिको (न) नहीं (प्रजानामि) जानता।
मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।