यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु | एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥42॥
हे अच्युत! आप (यत्) जो मेरे द्वारा (अवहासार्थम्) विनोदके लिये (विहारशय्यासनभोजनेषु) विहार, शय्या आसन और भोजनादिमें (एकः) अकेले (अथवा) अथवा (तत्समक्षम्) उन सखाओंके सामने (अपि) भी (असत्कृतः) अपमानित किये गये (असि) हैं (तत्) वह सब अपराध (अप्रमेयम्) अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले (त्वाम्) आपसे (अहम्) मैं (क्षामये) क्षमा करवाता हूँ।
हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।