पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् | न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥43॥
(त्वम्) आप (अस्य) इस (चराचरस्य) चराचर (लोकस्य) जगत्के (पिता) पिता (च) और (गरीयान्) सबसे बड़े (गुरुः) गुरु एवं (पूज्यः) अति पूजनीय (असि) हैं (अप्रतिमप्रभाव) हे अनुपम प्रभाववाले! (लोकत्राये) तीनों लाकोंमें (त्वत्समः) आपके समान (अपि) भी (अन्यः) दूसरा कोई (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अभ्यधिकः) अधिक तो (कुतः) कैसे हो सकता है।
आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।