तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् | पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु: प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥44॥
(तस्मात्) अतऐव प्रभो! (अहम्) मैं (कायम्) शरीरको (प्रणिधाय) भलीभाँति चरणोंमें निवेदित कर (प्रणम्य) प्रणाम करके (ईड्यम्) स्तुति करने योग्य (त्वाम्) आप (ईशम्) प्रभु को (प्रसादये) प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ (देव) हे देव! (पिता) पिता (इव) जैसे (पुत्रास्य) पुत्राके (सखा) सखा (इव) जैसे (सख्युः) सखाके और (प्रियः) प्रेमी पति जैसे (प्रियायाः) प्रियतमा पत्नीके अपराध सहन करते हैं वैसे ही आप भी मेरे अपराधको (सोढुम्) सहन करने (अर्हसि) योग्य हैं।
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।