न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: | एवंरूप: शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥48॥
(कुरुप्रवीर) हे अर्जुन! (नृलोके) मनुष्यलोकमें (एवंरूपः) इस प्रकार विश्वरूपवाला (अहम्) मैं (न) न (वेदयज्ञाध्ययनैः) वेद अध्ययनसे, न यज्ञों से (न) न (दानैः) दानसे (न) न (क्रियाभिः) क्रियाओंसे (च) और (न) न (उग्रैः) उग्र (तपोभिः) तपोंसे ही (त्वदन्येन)तेरे अतिरिक्त दूसरेके द्वारा (द्रष्टुम्)देखा जा (शक्यः) सकता हूँ।
हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।