अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत: ॥51॥
(जनार्दन) हे जनार्दन! (तव) आपके (इदम्) इस (सौम्यम्) अतिशान्त (मानषुम्, रूपम्) मनुष्य रूपको (दृष्टवा) देखकर (इदानीम्) अब मैं (सचेताः) स्थिर-चित्त (संवृत्तः) हो गया (अस्मि) हूँ और (प्रकृतिम्) अपनी स्वाभाविक स्थितिको (गतः) प्राप्त हो गया हूँ।
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।