मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्त: सङ्गवर्जित: | निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव ॥55॥
(पाण्डव) हे अर्जुन! (यः) जो (मत्कर्मकृत्) मेरे प्रति शास्त्रानुकूल सम्पूर्ण कत्र्तव्य-कर्मोंको करनेवाला है, (मत्परमः) मेरे मतानुसार श्रेष्ठ (मद्भक्तः) मतावलम्बी मेरा भक्त (संगवर्जितः) आसक्तिरहित है और (सर्वेभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणियोंमें (निर्वैरः) वैरभावसे रहित है (सः) वह (माम्) मुझको ही (एति) प्राप्त होता है। अर्थात् मेरे ब्रह्म लोक में बने महास्वर्ग में आ जाता है। जहाँ कभी.2 विष्णु रूप में यह काल दर्शन देता है। ब्रह्म काल को वास्तविक रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता। मतानुसार अर्थात् वेदों में वर्णित साधना के अनुसार {ब्रह्म साधना का मत(विचार) वेदों में वर्णन है या अब गीता जी में} जो साधक साधना करता है वह उत्तम साधक कहलाता है। क्योंकि अन्य साधना जो शास्त्रानुकूल नहीं है उसको करने वाले पापी तथा राक्षस स्वभाव के कहें हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 18, 20 से 23 तक में विस्तृत विवरण कहा है तथा शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा करना व्यर्थ है, (प्रमाण गीता जी के अध्याय 16 के श्लोक 23,24) वह भी काल को ही प्राप्त होता है अर्थात् काल(ज्योति निरंजन) के जाल में ही रहता है। पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने की विधि से गीता बोलने वाला भगवान भी अपरिचित है। इसलिए कहा है कि तत्वदर्शी संतों को खोज(गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा अध्याय18 श्लोक 62)।
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः।