न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा | दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम् ॥8॥
(तु) परंतु (माम्) मुझको तू (अनेन) इन (स्वचक्षुषा) अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा (द्रष्टुम्) देखनेमें (एव) निःसंदेह (न,शक्यसे) समर्थ नहीं है इसीसे मैं (ते) तुझे (दिव्यम्) दिव्य अर्थात् अलौकिक (चक्षुः) चक्षु (ददामि) देता हूँ उससे तू (मे) मेरी (ऐश्वरम्) ईश्वरीय (योगम्) योगशक्तिको (पश्य) देख।
परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।