मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥11॥
(मयि) मुझे (अनन्ययोगेन) अनन्य भक्ति के द्वारा (अव्यभिचारिणी) केवल एक इष्ट पर आधारित (भक्तिः) भक्ति (च) तथा (विविक्तदेशसेवित्वम्) एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और (जनसंसदि) विकारी मनुष्योंके समुदायमें (अरतिः) प्रेमका न होना।
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना।