सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥14॥
(तत्) वह (सर्वतःपाणिपादम्) सब ओर हाथ-पैरवाला (सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्) सब ओर नेत्रा सिर और मुखवाला तथा (सर्वतःश्रुतिमत्) सब ओर कानवाला है। क्योंकि वह (लोके)संसारमें (सर्वम्) सबको (आवृत्य) व्याप्त करके (तिष्ठति) स्थित है।
वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है)।