इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत: | मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥19॥
(इति) इस प्रकार (क्षेत्राम्) शरीर (तथा) तथा (ज्ञेयम्) जानने योग्य परमात्मा का (ज्ञानम्) ज्ञान (समासतः) संक्षेपसे (उक्तम्) कहा है (च) और (मद्भक्तः) मत् भक्त अर्थात् इस मत् अर्थात् विचार को जानने वाला जिज्ञासु को मद्भक्त कहा है अर्थात् मेरे मत् को जानने वाला मेरा भक्त(एतत्) इसको (विज्ञाय) तत्त्वसे जानकर (मद्भावाय) मतावलम्बी अर्थात् मेरे उसी विचार भाव को (उपपद्यते) प्राप्त हो जाता है काल अर्थात् मेरे ब्रह्म साधना त्याग कर पूर्णब्रह्म अर्थात् सतपुरुष की साधना करके जन्म-मरण से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाता है। विशेष:-- यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 9 में कहा है कि जो साधक पूर्व जन्मों में ब्रह्म साधना करता था। वह वर्तमान जन्म में भी उसी भाव से भावित रहता है। वह ब्रह्म साधना ही करता है। जब उसे तत्वदर्शी सन्त जो ब्रह्म व पूर्ण ब्रह्म की भक्ति की भिन्नता बताता है, मिल जाता है तो तुरन्त सत्य साधना पर लग जाता है।
इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।