Chapter 13, Verse 20



प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥20॥

Word Meanings

(प्रकृतिम्) प्रकृृति अर्थात् प्रथम माया जिसे पराशक्ति भी कहते हैं (च) और (पुरुषम्) पूर्ण परमात्मा (उभौ) इन दोनोंको (एव) ही तू (अनादी) अनादि (विद्धि) जान (च) और (विकारान्) राग-द्वेषादि विकारोंको (च) तथा (गुणान्) त्रिगुणात्मक तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तम्गुण शिव जी को (अपि) भी (प्रकृतिसम्भवान् एव) प्रकृृतिसे ही उत्पन्न (विद्धि) जान। यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 5 में भी है कि तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव जी प्रकृृति से उत्पन्न हैं।

Translation

प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।