Chapter 13, Verse 21



कार्यकारणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते | पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥21॥

Word Meanings

(कार्यकरणकतृत्वे) कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें (हेतुः) हेतु (प्रकृतिः) प्रकृृति (उच्यते) कही जाती है और (पुरुषः) सतपुरुष (सुखदुःखानाम्) सुख-दुःखोंके (भोक्तृत्वे) जीवात्मा को भोग भोगवाने के कारण भोगनेमें (हेतुः) हेतु (उच्यते) कहा जाता है। गीता अध्याय 18 श्लोक 16 में कहा है कि परमेश्वर सर्व प्राणियों को यन्त्रा की तरह कर्मानुसार भ्रमण कराता हुआ सर्व प्राणियों के हृदय में स्थित है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा तो गीता ज्ञान दाता से अन्य है। वही अविनाशी परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण पोषण करता है।

Translation

कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है) और करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।