अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते | तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: ॥26॥
(तु) इसके विपरित (अन्ये) इनसे दूसरे (एवम्) इस प्रकार (अजानन्तः) न जानते हुए (अन्येभ्यः) दूसरोंसे अर्थात् तत्वके जाननेवाले पुरुषोंसे (श्रुत्वा) सुनकर ही तदनुसार (उपासते) उपासना करते हैं (च) और (ते) वे (श्रुतिपरायणाः) कही सुनी मानने वाले (अपि) भी (मृत्युम्) मृृत्युरूप संसारसागरको (अतितरन्ति, एव) निःसन्देह तर जाते हैं। गीता अध्याय 5 श्लोक 4.5 में भी प्रमाण है।
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं।