यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥33॥
(यथा) जिस प्रकार (सर्वगतम्) सर्वत्रा व्याप्त (आकाशम्) आकाश (सौक्ष्म्यात्) सूक्ष्म होने के कारण (न, उपलिप्यते) लिप्त नहीं होता (तथा) वैसे ही (देहे) देहमें घड़े में सूर्य सदृृश (सर्वत्रा) सर्वत्रा (अवस्थितः) स्थित (आत्मा) आत्मा सहित परमात्मा देहके गुणोंसे (न,उपलिप्यते) लिप्त नहीं होता।
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।