लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥12॥
(भरतर्षभ) हे अर्जुन! (रजसि) रजोगुणके (विवृृद्धे) बढ़ने पर (लोभः) लोभ (प्रवृृत्तिः) प्रवृति स्वार्थबुद्धिसे (कर्मणाम्) कर्मोंका सकाम-भावसे (आरम्भः) आरम्भ (अशमः) अशान्ति और (स्पृृहा) विषय-भोगोंकी लालसा (एतानि) ये सब (जायन्ते) उत्पन्न होते हैं।
हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं।