Chapter 14, Verse 19



नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति | गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥19॥

Word Meanings

(यदा) जिस समय (द्रष्टा) विवेक शील साधक (गुणेभ्यः) तीनों गुणों - ब्रह्मा, विष्णु, शिव से (अन्यम्) अन्य को (कर्तारम्) करतार अर्थात् भगवान (न) नहीं (अनुपश्यति) देखता (सः) वह (च) और (गुणेभ्यः) तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तम्गुण शिव जी से (परम्) दूसरे पूर्ण परमात्मा को (वेत्ति) तत्वसे जानता है (मद्भावम्) वह मेरे मता अनुकूल विचारों को (अधिगच्छति) प्राप्त होता है। भावार्थ - श्लोक 19 का भावार्थ है कि जो साधक भक्ति तो तीनों प्रभुओं की ही करता है, अन्य को नहीं मानता तथा यह भी समझ लेता है कि वास्तव में भक्ति तो परमेश्वर की ही करनी चाहिए तो वह कभी न कभी सत्य भक्ति स्वीकार कर लेता है।

Translation

जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।