ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च | शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥27॥
(हि) क्योंकि उस (अव्ययस्य) अविनाशी (ब्रह्मणः) पूर्ण परमात्मा का (च) और (अमृतस्य) अमृतका (च) तथा (शाश्वतस्य) नित्य (धर्मस्य) पूजाका (च) और (ऐकान्तिकस्य) अखण्ड एकरस के (सुखस्य) आनन्दकी (प्रतिष्ठा) अवस्था अर्थात् भूमिका (अहम्) मैं हूँ अर्थात् उस परमात्मा की प्राप्ति भी मेरे माध्यम से ही होती है।
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः।