सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: | तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता ॥4॥
(कौन्तेय) हे अर्जुन! (सर्वयोनिषु) सब योनियोंमें (याः) जितनी (मूर्तयः) मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी (सम्भवन्ति) उत्पन्न होते हैं, (महत्) मूल प्रकृृति तो (तासाम्) उन सबकी (योनिः) गर्भ धारण करनेवाली माता है और (अहम् ब्रह्म) मैं (बीजप्रदः) बीजको स्थापन करनेवाला (पिता) पिता हूँ।
हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ।