तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥6॥
(अनघ) हे निष्पाप! (तत्रा) उन तीनों गुणोंमें (सत्त्वम्) सत्वगुण तो (निर्मलत्वात्) निर्मल होनेके कारण (प्रकाशकम्) प्रकाश करनेवाला और (अनामयम्) नकली अनामी है वह (सुखसंगेन) सुखके सम्बन्धसे (च) और (ज्ञानसंगेन) ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे (बध्नाति) बाँधता है।
हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है।