तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् | प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥8॥
(भारत) हे अर्जुन! (सर्वदेहिनाम्) सब शरीरधारियोंको (मोहनम्) मोहित करनेवाले (तमः) तमोगुणको (तु) तो (अज्ञानजम्) अज्ञानसे उत्पन्न (विद्धि) जान। (तत्) वह इस जीवात्माको (प्रमादालस्यनिद्राभिः) प्रमाद आलस्य और निंद्राके द्वारा (निबध्नाति) बाँधता है।
हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है।