अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित: | प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥14॥
(अहम्) मैं ही (प्राणिनाम्) मेरे अन्तर्गत प्राणियोंके (देहम्) शरीरमें (आश्रितः) शरण रहनेवाला (प्राणापानसमायुक्तः) प्राण और अपानसे संयुक्त (वैश्वानरः) जठराग्नि (भूत्वा)होकर (चतुर्विधम्)चार प्रकारके (अन्नम्)अन्नको (पचामि)पचाता हूँ।
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि) प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।