काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: ॥10॥
(दम्भमानमदान्विताः) दम्भ, मान और मदसे युक्त मनुष्य (दुष्पूरम्) किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली (कामम्) कामनाओंका (आश्रित्य) आश्रय लेकर (मोहात्) अज्ञानसे (असद्ग्राहान्) मिथ्या शास्त्रा विरुद्ध सिद्धान्तोंको (गृहीत्वा) ग्रहण करके और (अशुचिव्रताः)भ्रष्ट आचरणोंको धारण करके संसारमंे (प्रवर्तन्ते) विचरते हैं।
वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं।