असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥14॥
(असौ) वह (शत्राुः) शत्राु (मया) मेरे द्वारा (हतः) मारा गया (च) और उन (अपरान्) दूसरे शत्राुओंको (अपि) भी (अहम्) मैं (हनिष्ये) मार डालूँगा। (अहम्) मैं (ईश्वरः) ईश्वर हूँ (भोगी) ऐश्वर्यको भोगनेवाला हूँ। (अहम्) मैं (सिद्धः) सब सिद्धियोंसे युक्त हूँ और (बलवान्) बलवान् तथा (सुखी) सुखी हूँ।
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।