आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: ॥15॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: | प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥16॥
(आढ्यः) बड़ा धनी और (अभिजनवान्) बड़े कुटुम्बवाला या अधिक शिष्यों वाला (अस्मि) हूँ। (मया) मेरे (सदृशः) समान (अन्यः) दूसरा (कः) कौन (अस्ति) है मैं (यक्ष्ये) यज्ञ करूँगा (दास्यामि) दान दूँगा और (मोदिष्ये) आमोद-प्रमोद करूँगा। (इति) इस प्रकार (अज्ञानविमोहिताः) अज्ञानसे मोहित रहनेवाले तथा (अनेकचितविभ्रान्ताः) अनेक प्रकारसे भ्रमित चितवाले (मोहजालसमावृताः) मोहरूप जालसे समावृत और (कामभोगेषु) विषयभोगोंमें (प्रसक्ताः) अत्यन्त आसक्त आसुरलोग (अशुचै) महान् अपवित्रा (नरके) नरकमें (पतन्ति) गिरते हैं।
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं।