तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥3॥
(तेजः) तेज (क्षमा) क्षमा (धृतिः) धैर्य (शौचम्) शुद्धि (अद्रोहः) निर्वैरी और (नातिमानिता) अपनेआप को नहीं पूजवावै (भारत) हे अर्जुन! (दैवीम्,सम्पदम्) भक्ति भावको (अभिजातस्य) लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण (भवन्ति) होते हैं। विशेष:- श्लोक 4 से 20 तक उन व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन है जो पहले कभी मानव शरीर में थे तब भी शास्त्रा विधि अनुसार साधना नहीं की। फिर अन्य योनियों व नरक आदि में तथा क्षणिक सुख स्वर्ग आदि का भोग कर फिर मानव शरीर में आते हैं तो भी स्वभाववश वैसी ही साधना व विकारों में आरुढ़ रहते हैं।
तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखनी चाहिए) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।