प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥7॥
(आसुराः) आसुर-स्वभाववाले (जनाः) मनुष्य अर्थात् चाहे वे संत कहलाते हैं, चाहे उनके शिष्य या स्वयं शास्त्रा विधि रहित साधना करने वाले व्यक्ति (प्रवृत्तिम्) प्रवृति (च) और (निवृत्तिम्) निवृति इन दोनांेको (च) भी (न) नहीं (विदुः) जानते इसलिये (तेषु) उनमें (न) न तो (शौचम्) अंतर भीतरकी शुद्धि है (न) न (आचारः) श्रेष्ठ आचरण है (च) और (सत्यम्) सच्चाई (अपि) भी (न) नहीं (विद्यते) जानी जाती है। विशेष:- गीता अध्याय 15 श्लोक 15 तथा अध्याय 9 श्लोक 17 में वेद्यः या वेद्यम् का अर्थ जानना किया है।
आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।