Chapter 17, Verse 1



अर्जुन उवाच | ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: | तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तम: ॥1॥

Word Meanings

(कृष्ण) हे कृृष्ण! (ये) जो मनुष्य (शास्त्राविधिम्) शास्त्राविधिको (उत्सृृज्य) त्यागकर (श्रद्धया) श्रद्धासे (अन्विताः) युक्त हुए (यजन्ते) देवादिका पूजन करते है (तेषाम्) उनकी (निष्ठा) स्थिति (तु) फिर (का) कौन-सी (सत्त्वम्) सात्विकी है (आहो) अथवा (रजः) राजसी (तमः) तामसी? केवल हिन्दी अनुवाद: हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्राविधिको त्यागकर श्रद्धासे युक्त हुए देवादिका पूजन करते है उनकी स्थिति फिर कौन-सी सात्विकी है अथवा राजसी तामसी? विशेष:- अध्याय 17 श्लोक 2 से 22 तक उन शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् अपने-अपने स्वभाववश साधना करने वाले साधकों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक पूजाओं का वर्णन है जिसको गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में व्यर्थ कहा है। इसी लिए अर्जुन ने उपरोक्त इसी अध्याय 17 के श्लोक 1 में पूछा है, उसी का उत्तर देते हुए प्रभु ने कहा है कि जिस साधक का पिछले मनुष्य जीवन में जैसा स्वभाव था उसी का प्रभाव कभी फिर मनुष्य जन्म प्राप्त होता है वह उसी भाव में भावित रहता है। समझाने से भी नहीं मानता, उसे राक्षस स्वभाव के जान। ऐसे साधकों का विवरण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक पूर्ण व्याख्या के साथ कहा है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 8 श्लोक 5-6 में स्पष्ट किया है। इस अध्याय 17 के श्लोक 2 से 22 तक भले ही एक-दूसरे की तुलना का विवरण कहा है फिर भी शास्त्रा विधि रहित ही है। जिस कारण श्रेयकर नहीं है। इस अध्याय 17 श्लोक 23 से अन्तिम 28 तक पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति का विवरण है, जिसके लिए गीता अध्याय 4 श्लोक 34 व अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में विशेष प्रमाण है।

Translation

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?