अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते | यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्विक: ॥11॥
(यः) जो (विधिदृष्टः) शास्त्राविधिसे नियत (यज्ञः) यज्ञ (यष्टव्यम्, एव) करना ही कर्तव्य है (इति) इस प्रकार (मनः) मनको (समाधाय) समाधान करके (अफलाकाङ्क्षिभिः) फल न चाहनेवाले पुरुषोंद्वारा (इज्यते) किया जाता है (सः) वह (सात्त्विकः) सात्विक है। केवल हिन्दी अनुवाद: जो शास्त्राविधिसे नियत यज्ञ करना ही कर्तव्य है इस प्रकार मनको समाधान करके फल न चाहनेवाले पुरुषोंद्वारा किया जाता है वह सात्विक है। विशेष:- भले ही उपरोक्त श्लोक 11 में सात्विक यज्ञ का वर्णन भेद विधान अनुसार कहा है परन्तु गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में वर्णित तत्वदर्शी संत मिले बिना यह सात्विक साधना भी व्यर्थ है क्योंकि अध्याय 17 श्लोक 1 में अर्जुन ने शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने वालों के विषय में पूछा है जिसको गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में व्यर्थ बताया है। इसलिए यहाँ केवल स्वभाववश मनमाना आचरण करने वालों का ही विवरण चल रहा है। यह साधना भी व्यर्थ है।
जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है।