न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: ॥10॥
(अकुशलम्) अकुशल (कर्म) कर्मसे तो (न,द्वेष्टि) द्वेष नहीं करता और (कुशले) कुशल कर्ममें (न,अनुषज्जते) आसक्त नहीं होता वह (सत्त्वसमाविष्टः) सत्वगुणसे युक्त पुरुष (छिन्नसंशयः) संश्यरहित (मेधावी) बुद्धिमान् और (त्यागी) सच्चा त्यागी है।
जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।