अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् | विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥14॥
(अत्रा) इस विषयमें अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिमें (अधिष्ठानम्) अधिष्ठान (च) और (कर्ता) कत्र्ता (च) तथा (पृथग्विधम्) भिन्न-भिन्न प्रकारके (करणम्) करण (च) एवं (विविधाः) नाना प्रकारकी (पृथक्) अलग-अलग (चेष्टाः) चेष्टाएँ और (तथा) वैसे (एव) ही (प×चमम्) पाँचवाँ हेतु (दैवम्) दैव अर्थात् ईश्वरीय देन है।
इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है।