ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत: | प्रोच्यते गुणसङ् ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥19॥
(गुणसङ्ख्याने) गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रामें (ज्ञानम्) ज्ञान (च) और (कर्म) कर्म (च) तथा (कर्ता) कत्र्ता (गुणभेदतः) गुणोंके भेदसे (त्रिधा) तीन-तीन प्रकारके (एव) ही (प्रोच्यते) कहे गए हैं। (तानि) उनको (अपि) भी तू मुझसे (यथावत्) भलीभाँति (श्रृणु) सुन।
गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन।