अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यतत्तामसमुच्यते ॥25॥
(यत्) जो (कर्म) कर्म (अनुबन्धम्) परिणाम (क्षयम्) हानि (हिंसाम्) हिंसा (च) और (पौरुषम्) सामथ्र्यको (अनवेक्ष्य) न विचारकर (मोहात्) केवल अज्ञानसे (आरभ्यते) आरम्भ किया जाता है (तत्) वह कर्म (तामसम्) तामस (उच्यते) कहा जाता है।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।