यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी ॥31॥
(पार्थ) हे पार्थ! मनुष्य (यया) जिस बुद्धिके द्वारा (धर्मम्) धर्म (च) और (अधर्मम्) अधर्मको (च) तथा (कार्यम्) कर्तव्य (च) और (अकार्यम्) अकर्तव्यको (एव) भी (अयथावत्) यथार्थ नहीं (प्रजानाति) जानता (सा) वह (बुद्धिः) बुद्धि (राजसी) राजसी है।
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।