शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥42॥
(शमः) छूआ छूत रहित तथा सुख दुःख को प्रभु कृप्या जानना (दमः) इन्द्रियोंका दमन करना (तपः) धार्मिंक नियमों के पालनके लिये कष्ट सहना (शौचम्) बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना अर्थात् छलकपट रहित रहना (क्षान्तिः) दूसरोंके अपराधोंको क्षमा करना (आर्जवम्) मन, इन्द्रिय और शरीरको सरल रखना (आस्तिक्यम्) शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति से परमेश्वर तथा उसके सत्लोक में श्रद्धा रखना (ज्ञानम्) प्रभु भक्ति बहुत आवश्यक है। नहीं तो मानव जीवन व्यर्थ है, यह साधारण ज्ञान तथा पूर्ण परमात्मा कौन है, कैसा है? उसकी प्राप्ति की विधि क्या है इस प्रकार का ज्ञान (च) और (विज्ञानम्) परमात्माके तत्वज्ञान को जानना तथा अन्य तीनों वर्णों को शास्त्रा विधि अनुसार साधना समझाना (एव) ही (ब्रह्मकर्म) ब्रह्म के विषय में कत्र्तव्य कर्म को जानने वाले ब्रह्मण के कर्म हैं। जो (स्वभावजम्) स्वभाव जनित होते हैं क्योंकि भगवान प्राप्ति के विषय में भक्त के स्वाभाविक कर्म हैं।
अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।