शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥43॥
(शौर्यम्) शूर-वीरता (तेजः) तेज (धृृतिः) धैर्य (दाक्ष्यम्) चतुरता (च) और (युद्धे) युद्धमें (अपि) भी (अपलायनम्) न भागना (दानम्) दान देना (च) और (ईश्वरभावः) पूर्ण परमात्मामंे रूचि स्वामिभाव ये सब के सब ही (क्षात्राम्) क्षत्रियके (स्वभावजम्) स्वाभाविक (कर्म) कर्म हैं।
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।