Chapter 18, Verse 47



श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥47॥

Word Meanings

(विगुणः) गुण रहित (स्वनुष्ठितात्) स्वयं मनमाना अर्थात् शास्त्रा विधि रहित अच्छी प्रकार आचरण किए हुए (परधर्मात्) दूसरेके धर्म अर्थात् धार्मिक पूजा से (स्वधर्मः) अपना धर्म अर्थात् शास्त्रा विधि अनुसार धार्मिक पूजा (श्रेयान्) श्रेष्ठ है (स्वभावनियतम्) अपने वर्ण के स्वभाविक अर्थात् जो भी जिस क्षत्राी, वैश्य, ब्राह्मण व शुद्र वर्ण में उत्पन्न है (कर्म) कर्म तथा भक्ति कर्म (कुर्वन्) करता हुआ (किल्बिषम्) पापको (न आप्नोति) प्राप्त नहीं होता।

Translation

अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।