सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: | मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥56॥
(मद्व्यपाश्रयः) मेरे द्वारा बताए शास्त्रानुकूल मार्ग के आश्रित अर्थात् मतावलम्बी (सर्वकर्माणि) सम्पूर्ण कर्मोंको (सदा) सदा (कुर्वाणः) करता हुआ (अपि) भी (मत्प्रसादात्) मेरे उस मत अर्थात् शास्त्रानुकूल साधना के पूर्ण ज्ञान की कृृप्यासे (शाश्वतम्) सनातन (अव्ययम्) अविनाशी (पदम्) पदको (अवाप्नोति) प्राप्त हो जाता है। नोट: मत का भाव है कि जैसे कहते हैं कि संतमत सतसंग अर्थात् संतों द्वारा दिए गए विचारों के आधार पर परमात्मा का विवरण (सतसंग)। मत का अर्थात् प्रकरण अनुसार मेरा भी होता है।
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।